
50 करोड़ टेंडर घोटाला: बिना जांच शिकायत बंद, क्या पुलिस ने घोटाले पर डाला पर्दा?
पनवेल / नवी मुंबई | विशेष जांच रिपोर्ट
पनवेल महानगरपालिका के एक बड़े टेंडर में सामने आए ₹50 करोड़ के कथित घोटाले ने अब पुलिस तंत्र की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि डी.बी. एंटरप्राइजेज ने फर्जी दस्तावेज़ों और झूठी पात्रता के आधार पर यह टेंडर हासिल किया, लेकिन इस गंभीर आर्थिक अपराध की शिकायत को बिना किसी प्राथमिक जांच के ही बंद कर दिया गया।

घोटाले से ज़्यादा चौंकाने वाली बात — “बिना जांच क्लोज़”
शिकायतकर्ता के. कुमार ने 26 नवंबर 2025 को पनवेल शहर पुलिस थाने में लिखित शिकायत दी थी, जिसमें—

आपराधिक साज़िश
जालसाज़ी
सरकारी धन का दुरुपयोग
भ्रष्टाचार
जैसे गंभीर संज्ञेय अपराधों का उल्लेख था।
इसके बावजूद, पुलिस ने मात्र 5–6 दिनों के भीतर, यानी 03 दिसंबर 2025 को, यह कहते हुए फाइल बंद कर दी कि “मामला मनपा से जुड़ा है।”
सवाल यह है —
क्या ₹50 करोड़ के फर्जी टेंडर का मामला सिर्फ ‘प्रशासनिक’ होता है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम अनदेखी?
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस की यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार (2014) के सीधे विरोध में है।
इस फैसले में साफ कहा गया है कि—
“यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध दिखाई देता है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है।”
यहां न FIR दर्ज हुई,
न कोई प्राथमिक जांच,
न बयान,
न दस्तावेज़ों की पड़ताल।
तो सवाल उठता है—
क्या पुलिस ने जानबूझकर जांच से बचने का रास्ता चुना?
जांच अधिकारी पर सीधा आरोप
इस मामले में पनवेल शहर पुलिस के पुलिस निरीक्षक (प्रशासन) अभिजीत अंभंग की भूमिका सबसे ज्यादा विवादों में है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि—
उनका बयान दर्ज नहीं किया गया
किसी दस्तावेज़ की जांच नहीं हुई
कोई पंचनामा या फैक्ट-फाइंडिंग नहीं हुई
फिर भी शिकायत को “क्लोज़” कर दिया गया
इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता को 19 दिसंबर 2025 को पुलिस स्टेशन बुलाया गया, लेकिन वहां सिर्फ यह बताया गया कि केस बंद किया जा चुका है।
क्या यह जांच है या औपचारिकता निभाने का नाटक?
घोटाले से बड़ा सवाल — किसके इशारे पर?
₹50 करोड़ के सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में इतनी जल्दबाज़ी से फाइल बंद होना कई संदेह पैदा करता है—
क्या किसी दबाव में यह निर्णय लिया गया?
क्या प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश हुई?
क्या यह “सिस्टम फेलियर” है या “सिस्टम की मिलीभगत”?
इन सवालों के जवाब अभी तक किसी भी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से नहीं दिए हैं।
जनहित बनाम सिस्टम
यह मामला सिर्फ एक कंपनी या एक टेंडर का नहीं है,
यह जनता के टैक्स के पैसे,
प्रशासन की पारदर्शिता,
और कानून के राज से जुड़ा मामला है।
यदि ऐसे बड़े आर्थिक अपराधों की शिकायतें बिना जांच बंद होती रहीं, तो आम नागरिक का पुलिस और शासन पर भरोसा कैसे बचेगा?
अब क्या मांग की जा रही है?
शिकायतकर्ता ने राज्य सरकार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मांग की है कि—
शिकायत बंद करने का आदेश तुरंत रद्द किया जाए
मामले में FIR दर्ज हो
स्वतंत्र एजेंसी या SIT से जांच कराई जाए
संबंधित पुलिस अधिकारी की भूमिका की जांच हो
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार और पुलिस प्रशासन इस मामले में पारदर्शी कार्रवाई करेगा या यह फाइल भी बाकी घोटालों की तरह ठंडे बस्ते में चली जाएगी।
₹50 करोड़ का सवाल अब सिर्फ घोटाले का नहीं, बल्कि सिस्टम की साख का बन चुका है।
