
नरेश चोपड़ा की कलम से_
इन षडयंत्रों से पर्दा उठाना बहुत जरूरी है,
पहले अपने देश के गद्दारों को मिटाना बहुत जरूरी है?
जहां देश भक्तों की राज्यसभा में गद्दार गाने लगते हैं,वहां हाथी के मुंह से गने, चूहे खाने लगते हैं
आज दिल पर पत्थर रखकर मेरी कलम लिखने को मजबूर कर रही है सोचो वह किस मां का लाल होगा, कितना फौलादी रहा होगा, जिसने बिना किसी बंदूक के एक छोटी सी खुखरी से रॉयल बंगाल टाइगर को ढेर कर उसकको चैनकी नींद सुला दिया, आज हमारे देश का इतिहास कितना अलग होता_ अगर उस दिन अपनों ने यदि पीठ पर छुरा न घोपा होता !लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं उस देश भगत को, उस देशभक्त ने 1915 में ही भारत को गुलामी से आजाद करने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था?
मैं अपनी कलम से उस देशभक्ति का जिक्र कर रहा हूं देशभक्त क्रांतिकारी जतिंद्र नाथ मुखर्जी का! जिसको दुनिया
बाघा जतिन दा के नाम से जानती है जितेंद्र नाथ मुखर्जी का मुकाबला उन सफेद पौश भेडियो से था जिन्होंने मां भारती के पैरोंको गुलामी की जंजीरों से जकड रखा था !मुखर्जी का एक ही सपना था, देश के लिए मरना सीखो ताकि देश जी सके?
यदि 1915 में जितेंद्र नाथ के साथ गद्दारी ना हुई होती तो राष्ट्रपिता वही व्यक्ति होता यही सोचकर खून खोलता है कि शेर ने अकेले अपने दम पर रॉयल बंगाल टाइगर के जबड़े फाड़ दिए थे यदि उस वक्त हमारे ही हिंदुस्तानीयो ने उसे अकेला छोड़ दिया था हम 1947 की आजादी की सालगिरह मनाते हैं लेकिन 10 सितंबर 1915 कि उस काली दोपहर जब एक महानायक का सपना अपनों के ही गद्दारी और मुखवरी के कारण भेट चढ़ गया, मुझे उनकी बातें आज भी मेरे बदन में सिहरन पैदा कर देती हैं, जब साहस का वह मंजर अंग्रेजों ने गाड़ी की छत पर बैठकर भारतीय महिलाओं का अपमान किया तो जतिन दा अकेले उन सफेद भेडियो पर टूट पड़े और तब तक वार पर वार करते रहे जब तक अंग्रेजों ने पैरों में गिरकर माफी नहीं मागी उस दौर में जहां लोग अंग्रेजों के साये से डरते थे, जतिन दा ने उन्हें बीच सड़क पर गिरा गिरा कर पीट दिया करते थे विवेकानंद के वह शब्द उन्हें याद दिलाते रहते थे की मांसपेशियों में ही ब्रज जैसा संकल्प रहता है जो उन्होंने कर दिखाया?
गद्दारों की वही बगावत_ जब उन्होंने जर्मनी से हथियार मंगा कर एक साथ पूरे भारत में बगावत की योजना बनाई! चेक जासूस रास हडविक ने खुद लिखा_ यदि उस दिन वह प्लान सफल हो जाता तो आज राष्ट्रपिता बाघा जतिन दा होते? पर अफसोस एक गद्दार की मुखवरी ने हमें 32 साल और गुलामी की आग में झोक दिया?
10 सितंबर 1915 जब उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली तो उनका शरीर गोलियों से छलनी था परंतु चेहरे पर हार का गम नहीं लेकिन गद्दारी का अफसोस _भारत माता की प्रति समर्पण की चमक थी उन्हें पता था कि वह शाम उनकी आखिरी शाम थी फिर भी उन्होंने समर्पण की जगह संघर्ष चुना?
हमारा इतिहास गवाह है कि हम दुश्मनों से कमी नहीं हारे, हम तब हारे जब घर के ही किसी भेदी ने गद्दारी का दरवाजा खोला?
आज बाघा जतिन को सची श्रद्धांजलि ही नहीं होगी कि हम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाए बल्कि यह होगी कि हम अपने इतिहास के उन गुमनाम शहीदों के उन विसमृत नायको FOr gotten Heroes को पहचाने?
याद रखिए राष्ट्रहित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें आने वाली पीढियो को बताएं की आजादी केवल अहिंसा के चरखे से नहीं बल्कि जतिन दा जैसे शेरो के लहू से भी सीची गई है आज जब हम आजादी की खुली हवा में सांस लेते हैं तो एक पल रुक कर सोचिए कि हम उन बलिदानों के लायक बन पाए हैं?
लेकिन हमारे दिलों में उनकी मशाल जलती रहनी चाहिए! वाघा जतिन दा के चरणों में उस महान क्रांतिकारी बलिदानी को शत-शत नमन?
नरेश चोपड़ा लुधियाना पंजाब
