मानवता शर्मसार: ₹500 की पेंशन के लिए 90 साल की बुजुर्ग सास को कंधे पर लादकर तपती धूप में नंगे पैर बैंक पहुंची बहू विशेष रिपोर्ट: नरेश चोपड़ा, लुधियाना

लुधियाना/छत्तीसगढ़: क्या हमारे महापुरुषों ने इसी भारतवर्ष की कल्पना की थी? क्या आधुनिकता और डिजिटल इंडिया के दौर में हमारी संवेदनाएं पूरी तरह लुप्त हो चुकी हैं? ये सवाल आज हर उस इंसान के जेहन में कौंध रहे हैं जिसने भी इस दिल दहला देने वाले मंजर को देखा है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है।
​केवाईसी (KYC) के नियमों ने छीना बुजुर्ग का हक
​यह पूरा मामला डिजिटल नियमों और कागजी कार्रवाई के नाम पर एक बुजुर्ग के उत्पीड़न का है। 90 साल की एक बुजुर्ग महिला अपनी ₹500 की मासिक पेंशन के लिए पिछले 4 महीनों से बैंक के चक्कर काट रही थी। वजह सिर्फ इतनी थी कि बुजुर्ग महिला की केवाईसी (KYC) फॉर्मेलिटी पूरी नहीं हो पा रही थी। बैंक प्रशासन ने मानवीय आधार को ताक पर रखकर डिजिटल नियम उस लाचार परिवार पर थोप दिए। आखिरी बार जनवरी में इस बुजुर्ग महिला को पेंशन मिली थी, जिसके बाद दस्तावेजों की कमी का हवाला देकर इसे रोक दिया गया था।

कंधे पर सास, पैरों में छाले और सिस्टम की संवेदनहीनता
​छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट (जंगल पारा) की रहने वाली सुखमनिया नामक महिला के सब्र का बांध जब टूट गया, तो वह अपनी 90 साल की बुजुर्ग सास को अपने कंधे पर लादकर निकल पड़ी। कड़कड़ाती धूप, तपती सड़क और नंगे पैर… सुखमनिया अपनी सास को पीठ पर उठाकर ‘सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया’ की शाखा की तरफ बढ़ रही थी।
​रास्ते से गुजर रहे एक शख्स ने जब इस बेबसी को देखा, तो उसने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। वीडियो सामने आने के बाद ही इस पूरी घटना का दर्दनाक खुलासा हुआ।
​”वीडियो वायरल होते ही जागा बैंक प्रशासन”
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और चौतरफा थू-थू होने लगी, वैसे ही आनंद-फानन में बैंक प्रशासन हरकत में आया। जिस कागजी कार्रवाई के लिए महीनों से चक्कर लगवाए जा रहे थे, उसे कुछ ही मिनटों में पूरा करके बुजुर्ग महिला की 4 महीने की रुकी हुई पेंशन (कुल ₹2000) जारी कर दी गई।
​बड़ा सवाल: वीडियो वायरल होने का ही क्यों इंतजार करता है सिस्टम?
​इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में आत्माएं मर चुकी हैं और केवल स्वार्थ रह गया है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी गरीब को उसका हक देने के लिए हमेशा किसी वीडियो के वायरल होने का ही इंतजार किया जाएगा? क्या व्हीलचेयर या होम-वेरिफिकेशन जैसी बुनियादी सुविधाएं इन बुजुर्गों के लिए नहीं थीं? सुखमनिया ने बहू के रूप में जो फर्ज निभाया, उसने जहां एक तरफ सबका दिल जीत लिया, वहीं दूसरी तरफ हमारे सिस्टम के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा भी जड़ा है।
​लीड इंडिया टीवी वेब पोर्टल के लिए लुधियाना से नरेश चोपड़ा की रिपोर्ट।
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