
इतिहास केवल तलवारों से नहीं लिखा जाता इतिहास जज्बों, हौसलों की वह कहानी है जिसमें देश के लिए, कौम के लिए, वतन की आबरू, अस्मत की बल बेदी पर सर्वत्र बलिदान करने वाला योद्धा अपना सर्वत्र बलिदान कर देता है_24 दिसंबर 1704—ठंडी हवा में एक भयानक सन्नाटा पसरा था,गुरु गोविंद सिंह जी की माता_ माता गुजरी जी,और उनके दो मासूम पोते_साहबजादे जोरावर सिंह, फतेह सिंह_ गंगू नामक व्यक्ति की गद्दारी का शिकार होकर सरहिंद की ओर ले जा रहे थे !वे छोटे-छोटे बच्चे कोई अपराधी नहीं थे!वे तो ईश्वर की संतान सच्चाई की राह पर गुरु गोविंद सिंह जी की सच्चाई की संतान थे!पर सत्ता को सबसे ज्यादा डर,सच्चाई से ही लगता है,

सरहिंद पहुंचते ही वजीर खान नेउन मासूमों और एक बुजुर्ग मां को ठंडे बुर्ज में कैद कर लिया!ठंड इतनी की पत्थर भी कॉप जाए और उम्र इतनी कम, ठंड में सांस भी वोझ बन जाए!दुश्मन मुगल रसोई से भोजन भेजा गया,पर माता गुजरी ने साफ मना कर दिया_माता ने वचन कहे_ जिस जुल्म की रसोई में पक्का हो अन्न,वह पेट भरने का जरिया तो बन सकता है,पर आत्मा की तृप्ति नहीं कर सकता!उधर दूसरी तरफ दीवारों के उस पार_एक व्यक्ति सब कुछ देख रहा था,

नाम था बाबा मोतीराम मेहरा!वजीर खान की रसोई में सेवा करने वाला यह व्यक्ति सिर्फ रसोईया नहीं था वह गुरुओं का सेवक था और इंसानियत का पहरेदार था?जब उसे मालूम हुआ कि मासूम शहजादे और एक वृद्ध माता भूख और ठंड से जूझ रहे हैं उसका दिल कांप उठा वह जानता था कि अगर मदद की तो मौत तयहै_लेकिन उसने भी तय किया_

अगर मदद ना की तो इंसान कहलाने का कोई हक नहीं!अंधेरी रात,बाबा मोतीराम मेहरा चुपके सेदूध और पानी लेकर ठंडे बुर्ज तक पहुंचे!इस सेवा में उनके परिवार की पत्नी बीबी भोली जी तथा उनकी मां भी बराबर की हिस्सेदार थी, यह केवल सेवा नहीं थी यह अपनी जान को दाब पर रखी गई श्रद्धा थी?27 दिसंबर 1704 वह दिन,जिसे इतिहास कभी नहीं भूल सकता!दो मासूम साहब जादौ को, धर्म बदलने का लालच दिया गया, डराया गया, धमकाया गया,,,,,लेकिन उन साहिबजादो के सीने में गुरु गोविंद सिंह जी का खून साहस बनकर धडक रहा था!अतत: उन्हें दीवार में जिंदा ही चुनवा दिया गया और उसअसहानीय पीडा को माता गुजरी जी सहन नहीं कर सकी,

माता गुजरी जी वही जोत, जोत में समा गई !कुछ समय बाद,,, बाबा मोतीराम मेहरा की मदद सेवा का रहस्य खुल गया,सत्ता को उसे साहस की गंद आ रही थी ,बाबा मोतीराम मेहरा को उनकी बीवी भोली जी, माता-पिता और छोटे बेटे सहित गिरफ्तार कर गुरुओं से नाता तोड़ने को कहा_उत्तर छोटा था लेकिन इतिहास बड़ा उन्होंने कहा__*जिस धर्म ने मुझे इंसान बनना सिखाया* उससे मुंह मोड़कर में सांस तक नहीं लेना चाहता!और फिर_पूरा परिवार जुल्म का शिकार बना!कोई शोर नहीं, कोई माफी नहींबस एक बात साबित हो गई_*शहादत केवल तलवार उठाने से नहीं होती*कभी-कभी सच्चाई की राह पर चलना भी *क्रांति* बन जाता है!आज जब हम इतिहास पढ़ते हैं तो याद रखना_अगर साहिबजादे धर्म की दीवार बने,तो बाबा मोतीराम मेहरा उस दीवार की नीव थे,नमन है उन वीरों को जिन्होंने जुल्म के समय चुप रहना नहीं चुना_बल्कि अपने धर्म पर अडिग रहना सिखाया?*
लुधियाना से ब्यूरो हेड नरेश चोपड़ा की कलम से
