समंदर की बेटियाँ अब बदलाव की लहर: कोली महिलाओं की नई पहचान”मुंबई:अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महाराष्ट्र की पारंपरिक कोली समुदाय की महिलाओं की बदलती तस्वीर सामने आ रही है

“समंदर की बेटियाँ अब बदलाव की लहर: कोली महिलाओं की नई पहचान”मुंबई:अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महाराष्ट्र की पारंपरिक कोली समुदाय की महिलाओं की बदलती तस्वीर सामने आ रही है। कभी केवल मछली बाज़ार और घर की जिम्मेदारी तक सीमित समझी जाने वाली कोली महिलाएँ आज शिक्षा, नेतृत्व और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी नई पहचान बना रही हैं।

कोली समाज, जो महाराष्ट्र के तटीय इलाकों और खासकर मुंबई के सात द्वीपों के मूल निवासियों में माना जाता है, उसकी आर्थिक धड़कन लंबे समय से मछली व्यापार रही है।

इस व्यवस्था की असली कमान अक्सर महिलाओं के हाथों में रही है—वे मछलियों की प्रोसेसिंग, कीमत तय करने और बाजार में बिक्री तक की पूरी व्यवस्था संभालती रही हैं।

फिर भी यह आर्थिक ताकत लंबे समय तक सामाजिक पहचान में नहीं बदल पाई। समाज में “लोग क्या कहेंगे?” जैसी मानसिकता और शिक्षा के अवसरों की कमी ने कई पीढ़ियों तक कोली लड़कियों के सपनों को सीमित रखा।लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।

नई पीढ़ी की कोली महिलाएँ पारंपरिक पहचान को बचाते हुए आधुनिक शिक्षा और तकनीक से जुड़ रही हैं। वे अपने समाज की संस्कृति को संजोते हुए नए अवसरों की ओर कदम बढ़ा रही हैं।समाज की कुछ जागरूक महिलाएँ, जैसे श्रद्धा, जिन्होंने शिक्षक के रूप में काम किया और अब कोली लड़कियों को प्रेरित कर रही हैं, इस बदलाव की आवाज बन रही हैं। उनका उद्देश्य है कि आने वाली पीढ़ी खुद को किसी भी सामाजिक “कैद” में महसूस न करे।

पर्यावरणीय बदलाव, समुद्री संसाधनों में कमी और शहरीकरण ने पारंपरिक मछली व्यापार को भी प्रभावित किया है। ऐसे में कोली महिलाएँ अब डिजिटल प्लेटफॉर्म और नए व्यवसायिक मॉडल की ओर बढ़ रही हैं।संदेश साफ है—आज की कोली महिला केवल परंपरा की रक्षक ही नहीं, बल्कि भविष्य की निर्माता भी है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यह कहानी बताती है कि जब अवसर और आत्मविश्वास मिलता है, तो समाज की हर महिला बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

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